मैं हिन्दू हूँ 💞🕉️🚩🙏

जय श्री राम,
भगवा अपना जीवन हैं, भगवा अपनी पहचान,
भगवा से हैं हिन्दू, और भगवा से ही हिन्दुस्तान।
💞🕉️🚩🙏
दार्शनिक संतोषकुमार भागीरथी  पाण्डेय

मैं हिन्दू हूँ :- 
  हिन्दू शब्द राष्ट्र वाचक है  जाति या संप्रदाय वाचक नहीं ... एक मातृभूमि , समान इतिहास, समान परंपरा, समान संस्कृति, समान आदर्श, समान जीवन लक्ष्य ,समान सुख-दुःख, समान शत्रु -मित्र  भाव, समान आशा-आकांछा आदि भावों से ही राष्ट्रीयता प्रकट होती है . भारत की उन्नति और विजय से सभी राष्ट्रिय शक्तियों को प्रसन्नता तथा पराजय से दुःख स्वाभाविक है. जिसका व्यवहार इसके विपरीत हो वह अराष्ट्रीय श्रेणी में आता है . भारत के उत्थान पतन का इतिहास ही हिन्दुओं का इतिहास है !

        गेहूं के खेत में कुछ अन्य पौधे होने पर भी वह खेत गेहूं का ही कहा जायेगा और जो कम मात्रा में पौध है उसको अल्पसंख्या में है यह पौध ऐसा विचार कर उसको ही बहुतायत से नहीं रोपा जा सकता या यूँ भी कह सकते है कि उसको ऐसी सुविधाएं प्रदान नहीं की जा सकती जिससे कि वह गेहूँ कि पौध को नष्ट कर दे . ऐसा उस हाल में तो कदापि संभव नहीं जब कि वो गेहूँ के लिए उसके  खेत के भविष्य के लिए  अभिशाप बनने जा  रही हो  ...
    
   राष्ट्र तीन चीज़ों भूमि , भूमि पर रहने वाला एक जनसमुदाय जो उसे माता जैसा मानता है ,और उस जन समुदाय की संस्कृति से मिलकर बना है . जिस प्रकार मानव का शरीर में प्राणतत्व न होने पर मानव मर जाता है उसी प्रकार संस्कृति राष्ट्र की आत्मा है इसके बिना राष्ट्र मर जाता है . जिन्हें अपने पूर्वजों से अपनत्व है वो हिन्दू है जीव मात्र को जीवित रहने का अधिकार है ऐसा हिन्दू विचार है  जो कमाएगा वही खायेगा ऐसा तो कम्युनिष्ट विचार धारा है , जो भी पैदा हुआ है वह खायेगा ऐसा हिन्दू विचारधारा है..
    
    भारत के सुख में सुख , दुःख में दुःख सभी मतावलंबियों  को होना ही चाहिए कर्तव्य को करना ही धर्म है, इस प्रकार हिंदुत्व एक जीवन पद्धति है  न की कोई संप्रदाय  , तो इसका सांप्रदायिक होना तो असंभव ही है ..
     'यूनान रोम मिश्र मिट गए जहाँ से ,
  क्या बात है कि जीवित है हिन्दुस्थान हमारा '


मैं हिन्दू ब्राह्मण :- 
ब्राह्मण परिवार जो सभी चार वेदों में विशिष्ट हैं, उन्हें चतुर्वेदी (संस्कृत में चतुर्थ का अर्थ है जहाँ से यह प्राप्त होता है) के रूप में   जाना जाता है, जो तीन वेदों में विशिष्ट थे उन्हें त्रिवेदी या तिवारी या त्रिपाठी कहा जाता है (संस्कृत में त्रि अर्थ तीन ), जबकि द्विवेदी ने दो वेदों ( द्वि-अर्थ दो ) में विशेषज्ञता प्राप्त की। जिन्होंने केवल वेद का अध्ययन किया लेकिन उनमें विशेषज्ञता नहीं थी उन्हें पाठक, यानी पाठक के रूप में जाना जाने लगा। जो उपनिषदों में विशिष्ट थे, उन्हें जाना जाता था उपाध्याय।

पांडेयजी (पंडित या विशेषज्ञ) नाम ने ब्राह्मणों को संकेत दिया जो सभी चार वेदों के साथ-साथ पुराणों में भी विशिष्ट हैं और वैदिक ज्ञान का प्रचार करते हैं और वैदिक प्रथाओं का संचालन करते हैं। उत्तर भारत में ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज ब्राह्मण और सरयूपारीण ब्राह्मण के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

पाण्डेय को सरयूपारी के नाम से जाना जाता है ब्राह्मण, उत्तर भारतीय ब्राह्मण हैं के पूर्वी मैदान पर रहते हैं अयोध्या के पास सरयू। सरयूपारी पांडे, पाठक और दीक्षित परिवार पूरी तरह से पढ़ने में शामिल थे और वेद और अन्य धार्मिक उपदेश ग्रंथ, यज्ञ और अन्य कार्य करना धार्मिक अभ्यास।

कुछ लोग यह भी कहते हैं कि शब्द माना जाता है कि पांडे से व्युत्पन्न है पंड्या शब्द, जो सबसे पुराना था भारत का राजवंश और तीन में से एक प्राचीन तमिल के राजवंश राज्य। माना जाता है कि द पांड्य शासकों के प्रभाव में उनकी वजह से उत्तर और मध्य भारत सफल आक्रमणों ने लोगों को बनाया पांड्या नाम को उपनाम के रूप में अपनाएं।
इसी तरह के नाम "देशपांडे" हैं यह भी माना जाता है कि इसी तरह की उत्पत्ति के द्वारा विद्वानों। "
मन भी भगवा, तन भी भगवा, भगवा रंग जवानी का,
कहत कबीर सुनो भाई साधो, रंग हैं ये बलिदानी का। 💞🕉️🚩🙏

 मेरा गोत्र : सांकृत्य ‘गोत्र :-
ऋषि  संकृति, सांकृत्य गोत्र के  संस्थापक ऋषि हैं।     सांकृत्य के वंश को शक्ति, संक्रांति और गौरीविता के रूप में दिया गया है। शक्ति,  सांकृत्य ( संक्रांति ) और गौरीवती का वंश।
संकृति ( सांकृत्य )ऋषि वशिष्ठ के पोते, और शक्ति महर्षि के पुत्र हैं। संयोग से, शक्ति महर्षि ऋषि पराशर (ऋषि व्यास के पिता) हैं।
अवधूत उपनिषद में उनके नाम के आंकड़े हैं , जहां भगवान दत्तात्रेय ऋषि संक्रांति को अवधूत की प्रकृति बताते हैं। गोत्र,  सांकृत्य ( संक्रांति या संक्रांति ) से हो सकती है !
‘ सांकृत्यायन ‘ उत्तर भारत के ‘ सरयूपारीण ‘ अथवा ‘ सरवरिया ‘ ब्राह्मणों की मलाँव-शाखा के लिए प्रयुक्त होने वाला गोत्रवाची शब्द है। ये ब्राह्मण मुख्यत: उत्तरप्रदेश, बिहार तथा मध्यप्रदेश के लगभग 3 दर्जन जिलों में फैले हुए हैं । हाल तक इनकी सबसे बड़ी अच्छाई पांडित्य (खासकर संस्कृत में ) और सबसे बड़ी बुराई सामाजिक संकीर्णता (खासकर समुद्र-लंघन से परहेज) हुआ करती थी। सरयूपारीण ब्राह्मणों के 16 गोत्र माने जाते हैं । ‘ सांकृत्य ‘ उन्हीं में से एक है।
निवेदन करना चाहूंगा कि सांकृत्य गोत्रधारी लोग सरयूपारीण (सरवरिया) के अलावा कान्यकुब्ज ब्राह्मणों में भी होते हैं । कान्यकुब्जों में सांकृत्य गोत्रधारी ब्राह्मणों के मूल ग्राम हैं – – कौशिकपुर, पुरैनियां (बाद चलकर जाजामऊ ), गौरा, विजौली, चचेंडी, इटावा इत्यादि। ऐसी मान्यता है कि ये लोग मूलतः सरवरिया या शाकलद्वीपी (शाकद्वीपी) ब्राह्मण थे। कान्यकुब्जों के साथ विवाह-संबंध के कारण ही ये कान्यकुब्ज कहलाए। सांकृत्य या सांकृत गोत्रधारी एक ऐसे ही ब्राह्मण थे कुरहर ग्रामवासी – पृथ्वीधर । एक बार कौशिक के राजा ने इन्हें बुलाकर ‘ अवस्थ’ यज्ञ कराया। कहते हैं, तभी से पृथ्वीधर कौशिकपुर के ‘ अवस्थी ‘ कहलाने लगे । कान्यकुब्जों में ‘ अवस्थी ‘ उपनामधारी ब्राह्मण इन्हीं के वंशज हैं ।
गोरखपुर जिले का ‘ मलाँव ‘ नामक गांव इन ‘ सांकृत्यों ‘ का मूल स्थान माना जाता है। सांकृत्य गोत्रधारी इन ब्राह्मणों के तीन प्रवर माने जाते हैं- अंगिरा, संकृति तथा गौरिवीति। लेकिन, डॉ. इंद्रदेव प्रसाद चतुर्वेदी-कृत पुस्तक ‘ सरयूपारीण ब्राह्मण-वंशावली ‘ में इनके पांच प्रवर बताए गए हैं; जैसे – कृष्णात्रेय, अर्चनानस, श्यावा, सांख्यायन तथा संकृति। इस मत को मानने वाले बहुत कम हैं । ‘ कान्यकुब्जभास्कर ‘ (हजारीलाल त्रिपाठी-कृत) नामक पुस्तक में तीन ही प्रवरों का उल्लेख मिलता है; यथा- सांकृत , किल और सांख्यायन। इस मत की पुष्टि ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित ‘सांकृत्य वंश-वृक्ष’ से भी हो जाती है । लेकिन, यहां प्रवरों का क्रम इस तरह मिलता है- किलायन, सांख्यायन तथा सांकृत।
‘सांकृत्य ‘ के बारे में कहा जा सकता है कि यह ‘ संकृति ‘ का अपत्यवाचक (संतानवाचक) विशेषण शब्द है ।’ संकृति ‘ सप्तर्षियों में एक ‘ अंगिरा ‘ की पांचवी पीढ़ी में हुए थे । वंशानुक्रम इस तरह है : अंगिरा> बृहस्पति> भरद्वाज> विदथी (वितथ) > नर> संकृति। आगे चलकर ‘ संकृति ‘ के भी दो पुत्र हुए – 1.गौरिवीति 2 रंतिदेव। इन दोनों में गौरिवीति को ‘गौरिवीति सांकृति’ भी कहा जाता है,जो ऋग्वेद के मंत्रकर्ता ऋषि हुए। दूसरी ओर ‘ रंतिदेव ‘ प्राग्महाभारत-काल के प्रसिद्ध 16 राजाओं में 14 वें क्रम पर अधिष्ठित थे । इसका उल्लेख महाभारत के द्रोणपर्व और शांतिपर्व में हुआ है । महाभारत के वनपर्व के अनुसार, रंतिदेव सांकृति का राज्य मध्यप्रदेश के चर्मण्वती (आज की चंबल नदी) के पास अवस्थित था । वे न केवल अपनी दानशीलता, बल्कि अतिथि-सेवा के लिए भी चर्चित हुए । कहते हैं , उनकी रसोई में दो लाख रसोइए हुआ करते थे।
जो हो, ‘ संकृति ‘ ऋग्वेद के मंत्रकर्ता ऋषि ‘ नर ‘ के पुत्र थे। ‘ नर ‘ के नाम से ऋग्वेद के छठे मंडल के 35-36 वें सूक्त में दस ऋचाएँ मिलती हैं, जिनमें उन्होंने देवराज इंद्र के पराक्रम की प्रशंसा करते हुए अपने वंशजों के लिए गोधन की याचना की है । नर अपने पांच भाइयों – सुहोत्र, शुनहोत्र, नर, गर्ग तथा ऋजिश्वा में तीसरे थे।
ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार बृहस्पति-पुत्र ‘ भरद्वाज ‘ के चचेरे भाई दीर्घतमा, अर्थात् गोतम ने शकुंतला और दुष्यंत के पुत्र भरत का राज्याभिषेक कराया था। कहते हैं , भरत की संतानें तो कई हुईं, पर बची एक भी नहीं। परिणामस्वरूप,उन्होंने दीर्घतमा की प्रेरणा से भरद्वाज को गोद ले लिया , पर वे गद्दी पर बैठे नहीं। अपनी जगह अपने पुत्र विदथी (वितथ) को हस्तिनापुर का राजपाट सौंपकर वे ऋषि-कर्म में दत्तचित्त हो गए। महाभारत तथा अन्य साक्ष्यों के अनुसार, महाराजा ‘ कुरु ‘ इन्हीं की पांचवी पीढ़ी में पैदा हुए थे , जबकि ‘ जह्नु ‘ सातवीं तथा कौरव- पांडव तीसवीं पीढ़ी में।
इसतरह, भरद्वाज-पुत्र विदथी से क्षत्रिय वंश का उद्भव हुआ, जिसकी संपुष्टि महाभारत का आदिपर्व करता है- “तस्मात् दिव्यो भरद्वाजो ब्राह्मण्यात् क्षत्रियोS भवत्। ”
इसप्रकार, ‘ संकृति ‘ की संतान सांकृति/सांकृत/सांकृत्य कहलाई और उसकी संतान सांकृत्यायन। व्याकरणिक दृष्टि से इसका विकास-क्रम यों दिखाया जा सकता है – सङकृतेः अपत्यं सांकृत्यः, तस्य अपत्यं सांकृत्यायनः। सङकृतिः+ष्यङ्= साङकृत्यः+फक्= साङकृत्यायनः (‘ नडादिभ्यः फक् ‘ सूत्र से फक् के स्थान पर आयन का आदेश हुआ।)
यदि राहुल जी का कोई पूर्वज ‘ संस्कृति ‘ नामवाची व्यक्ति रहा होता तो सांस्कृत्यायन शब्द बना होता । लेकिन, भाइयो और बहनो! इस नाम का कोई व्यक्ति उस काल में हुआ ही नहीं । अब आप ही बताइए, राहुल जी के संदर्भ में सांस्कृत्यायन का प्रयोग कैसे और क्यों होगा?
इसलिए, महापंडित राहुल जी के लिए ‘सांकृत्यायन’ का ही प्रयोग करें । यह हर तरह से उचित है।
 रंतिदेव राजा (सांकृत्य) , संकृति के पुत्र सांकृत्य गोत्रीय, भरत वंशीय सम्राट् है जिनकी विस्तृत कथा श्रीमद्भागवत में मिलती है। 
   ये परम धार्मिक, यज्ञकर्ता, दानवीर के रूप में प्रसिद्ध हैं। 
सांकृत्य ब्राह्मण : 
रंतिदेव राजा के एवं इसके भाई गुरुधि के वंशज जन्म से क्षत्रिय हो कर भी ब्राह्मण बन गयें । इस कारण वे ‘सांकृत्य ब्राह्मण’ कहलाते थें । कलोपरान्त ये आंगिरस कुल में शामिल हो गये, जिसके एक गोत्रकार के नाते उनका निर्देश पाप्त है ! 
महाराज रन्तिदेव दया के मुर्तिमान स्वरूप थे। क्यों ली भगवान ब्रम्हा, विष्णु और महेश ने महाराज रन्तिदेव की दया परीक्षा, आइए जानते है इस कथा के माध्यम से, जानिए दया के मूर्तिमान स्वरूप महाराज रन्तिदेव की कथा
रघुवंश में एक संकृति नाम के परम प्रतापी राजा थे उनके गुरू और रन्तिदेव नाम के दो पुत्र थे। रन्तिदेव दया मुर्तिमान स्वरूप थे। उनका एकमात्र लक्ष्य था संसार के सभी प्राणियों के दु:ख का निदान । वे भगवान से प्रार्थना करते हुए कहते थे- मैं आपसे अष्टसिद्धि या मोक्ष की कामना नहीं करता। मेरी आपसे इतनी ही प्रार्थना है कि समस्त प्राणियों के अन्त के कारण स्थित होकर मैं ही उनके दु:खों को भोग लूँ, जिससे सब दु:खरहित हो जायँ इसलिये महाराज रन्तिदेव यही सोचते रहते थे कि मेरे माध्यम से कि दीनों का उपकार कैसे हो, मैं दुखी प्राणियों के दु:ख किस प्रकार दूर करूँ। अत: उनके द्वार से कोई भी याचक कभी विमुख नही लौटता था। वह सबकी यथेष्ट सेवा करते थे। इसलिये उनका यश सम्पूर्ण भूमण्डलपर फैल गया।
संसार की वस्तुएँ चाहे कितनी ही अधिक क्यों न हों, उन्हें निरन्तर खर्च करने पर एक न एक दिन समाप्त हो जाती हैं महाराज रन्तिदेव का राजकोष भी दीनों को बाँटते- बाँटते एक दिन खाली हो गया यहाँतक कि उनके पास खोने के लिए एक मुट्ठीभर अन्न भी न रहा वे अपने परिवार के साथ जंगल में निकल गये। एक बार उन्हें अन्न क्या पीने के लिए जल की एक बूंद भी नही मिली परिवारसहित उन्हें बिना कुछ खाये पिये 48 दिन व्यतीत हो गये।
भगवान की कुपा से 49वें दिन महाराज रन्तिदेव को कहीं से खीर हलवा और जल प्राप्त हुआ। भगवान का स्मरण करके वे उसे अपने परिवार में विपरित करके पाना ही चाहते थें अचानक एक ब्राम्हाणदेव आ गये । उन्होंने कहा राजन मैं भूखे से अत्यनत व्याकुल हुँ। कृपया मुझे भोजन देकर तृप्ति प्रदान करें। महाराज ने ब्राम्हाण को बड़े ही सत्कार से भोजन काराया और ब्राम्हाण देव संतुष्ट होकर तथा राजा को आशीर्वाद देते हुए चले गये महाराज ने बचा हुआ अन्न अपने परिवार में वितरित करने के लिए सोचा इतने में एक शूद्र ने आकर अन्न की याचना की महाराज ने उसे भी तृप्त कर दिया। तदनन्तर एक व्यक्ति कई कुत्तों के साध वहाँ आया और बोला मैं और मेरे दो कुत्ते भूखे हैं। हमें अन्न देकर हमारी आत्मा को तृप्त करें।
 
महाराज रन्तिदेव अपनी भूख प्यास भूल गये। और बचा हुआ सारा अन्न उस व्यक्ति को दे दिया। अब उनके पास मात्र एक व्यक्ति की प्यास बुझाने लायक जल ही अवशेस रह गया था। महाराज उस जल को बांटकर पीना ही चाहते थे कि तभी एक चाण्ड़ाल ने उसके पास आकर जल की याचना की, महाराज ने प्रसन्नतापूर्वक वह जल भी उसे पिलाकर तृप्त कर दिया वास्तव में ब्राम्हाण, शूद्र और चाण्डाल के वेश में स्वयं भगवान विष्णु, ब्रम्हा और महेश ही महाराज की परीक्षा लेने आये थे। प्राणिमात्र पर दया के कारण महाराज रन्तिदेव को अपने परिवार के साथ योगियों के लिये भी दुर्लभ भगवान का परम धाम प्राप्त हुआ। भगवान अपने अंशभूत जीवों से प्रेम करने वालों पर ही अधिक संतुष्ट होते हैं संसार के समस्त प्राणी भगवान के ही विभिन्न रूप हैं जो भगवद्बुद्धि से सबकी सेवा करते हैं, वे दुस्तर संसार सागर से सहज ही तर जाते हैं। 
❣️🕉️ संकृति के पुत्र सांकृत्य गोत्रीय,
गुरु और रंतिदेव
त्याग का ही लक्ष्य एकमेव 
भरत वंशीय सम्राट्
राजा रंतिदेव की करुणा और दानशीलता 
थी अद्भुत और विराट 
जीवन को निकट से जाना 
प्रजा की सेवा को सर्वोपरि माना 
कर के प्रजा हित का भान 
सर्वस्व कर दिया दान 
राजा होकर भी खुद प्रजा की तरह जीने लगे 
जीवन का हर दुःख सपरिवार पीने लगे 
जो कमाया उसे तत्काल बाँट दिया 
राजा और प्रजा की दूरी को पाट दिया 
वह भी दिन आया 
अड़तालीस दिनों तक कुछ भी न पाया 
नहीं कुछ खाया 
जर्जर हो गयी काया 
अगले दिन जब कही से 
कुछ अन्न और जल पाया 
ग्रहण कर जीवन बचाने का समय था आया 
तभी एक ब्राह्मण अतिथि आ गए 
सामने की थाल अतिथि ही खा गए 
बचा जूठन पाने को थे तैयार 
तभी एक शूद्र अतिथि आये द्वार 
भूखे राजा ने उसे भी जिमाया 
फिर अतिथि से बचा जूठन खाने वाले थे 
तभी एक और मनुष्य आया 
जिसने कई कुत्ते भी पाले थे 
राजा ने उसके पूरे कुनबे को भी जिमाया 
पानी की तरफ हाथ बढ़ाया 
कुछ घूँट लेने ही चले थे 
तब तक कणो में पड़े थे 
चांडाल के बोल 
राजन आँखे खोल 
बहुत प्यासा हूँ? पानी पिला दो 
किसी तरह मुझे जिला दो 
जो खुद भूख और प्यास से व्याकुल थे 
प्राण निकलने को व्याकुल थे 
रंतिदेव ने बचा हुआ पानी भी 
चांडाल को ही पिला दिया 
उसे जिला दिया 
खुद को और अपने कुल को 
रख कर फिर भूखा और प्यासा
दान और भक्ति का किया सम्मान 
ऐसा था एक प्रजापालक का स्वाभिमान 
यह रंतिदेव की ब्रह्म परीक्षा थी 
ब्रह्मा? विष्णु? महेश की इच्छा थी 
मांगने जब कहा तो राजा निहाल हो गए 
उनके शब्दों से तीनो लोक बेहाल हो गए 
समाने खड़े त्रिदेव 
और कहते जा रहे रंतिदेव -
राज्यं न प्रार्थये,
स्वर्गं न प्रार्थये ।
मोक्षमपि न प्रार्थये ।
किन्तु दुःखतप्तानां जीविनां 
दुःखनाशमात्रम् इच्छामि ।
न त्वहं कामये राज्यं 
न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।
कामये दुःखतप्तानां 
प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्।
न तो राज्य की कामना 
 न स्वर्ग की 
और न ही मोक्ष की, 
बस यही कामना 
प्राणियों के कष्ट कर सकू दूर 
न मनुष्य हो मजबूर 
यहथी रंतिदेव की भक्ति 
नष्ट हो गयी 
त्रिगुणमयी माया की भी शक्ति 
यह है भक्ति? यही है ज्ञान 
गौतम इसमें कही नहीं है अभिमान 
सनातम में यह रंतिदेव की परंपरा है
देखो? यहाँ कितनी त्वरा है 
तुम्हारा ज्ञान यहाँ पानी ही भरेगा 
जिसका जन्म हुआ है 
वह अवश्य मरेगा। 💐🙏
 
मलांव का लगभग 115 साल पुराना श्रीभवन घुमक्कड़ महापण्डित राहुल सांकृत्यायन के पूर्वजों की याद दिलायेगा। श्रीभवन को हेरिटेज बनाने की पहल शुरू हो गयी है। इस हवेली के मालिक और रिश्ते में राहुल के प्रपौत्र लगने वाले शरदेंदु कुमार पाण्डेय ने भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय से पत्राचार शुरू कर दिया है। उन्होंने इसके लिए भागदौड़ भी की है। यदि उनके इस प्रयास को मूर्त रूप नहीं मिला तो भी इस ऐतिहासिक धरोहर को वे यादगार बनायेंगे। मलांव राहुल के पूर्वजों का गांव है। इस गांव के इतिहास में यश और पौरुष की कीर्ति पताका है तो कुछ त्रासद कथा भी है।
16वीं सदी में अपनी पत्नी के अपमान से क्षुब्ध डोमिनगढ़ के राजा ने इस गांव में कत्ले आम कर खून की नदी बहा दी। मलांव के एक एक बच्चे, बड़े-बूढ़े और स्ति्रयों को भी मौत के घाट उतार दिया। कोई नहीं बचा। एक गर्भवती बहू अगर अपने पीहर न गयी होती तो मलांव का सूरज डूब गया होता। उनके ही वंश से फिर पीढि़यों का सिलसिला चल पड़ा और आज यह ऐतिहासिक गांव अपनी पूरी ताकत से दुनिया के साथ कदमताल कर रहा है। मलांव में राप्ती तट पर 1895 में बना बना श्रीभवन उन सभी स्मृतियों का प्रतीक है। इस महल का कैम्पस 30 एकड़ में फैला है। इस महल को हेरिटेज बनाने की प्रक्रिया में जुटे शरदेंदु पाण्डेय बताते हैं-मलांव के पाण्डेय विद्वता के साथ ही अपने भुजबल के लिए पहचाने जाते हैं।
इतिहास के पन्नों में इस गांव की गौरवगाथाएं दर्ज हैं लेकिन जो रोमांचित करने वाली बात है उसका जिक्र राहुल सांकृत्यायन ने भी अपनी पुस्तक कनैला की कथा और मेरी जीवन यात्रा में किया है। दस्तावेज के मुताबिक 16वीं सदी में डोमिनगढ़ के डोमकटार राजा की पत्नी तीर्थ के लिए वाराणसी जा रही थीं। रानी को किसी ने बताया था कि मलांव के कुएं का पानी पीने से बंध्या पुत्रवती हो जाती हैं। वीर संतान पैदा करने की अभिलाषा से रानी ने मलांव में अपना कारवां रोककर वहां के कुएं से एक घड़ा पानी मंगवाया। पाण्डेय लोगों ने रानी के आदमियों को पानी भरने से रोक दिया। तीर्थ से लौटकर रानी ने राजा को अपने अपमान की कथा सुनायी। अनंत चतुर्दशी को मलांव के पाण्डेय लोग व्रत रखते और हथियार साफ कर उन्हें सजाते थे। उसी दिन राजा ने निहत्थे लोगों पर धावा बोल दिया। मलांव के एक एक बच्चे मारे गये। महिलाओं को भी आक्रमणकारियों ने नहीं बख्शा। जिस कुएं से रानी को पानी नहीं लेने दिया गया उसको ऊपर तक लाशों से पाट दिया गया। यहां कोई नहीं बचा था।
राहुल सांकृत्यायन ने कनैला की कथा में लिखा है- महाभारत में कौरव पाण्डव कुल का एक तरह बिल्कुल संहार हो गया था, लेकिन अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में परीक्षित के रूप में एक अंकुर बच रहा था जिसने पाण्डव वंश को नष्ट होने से बचाया। ठीक यही बात मलांव में हुई। राजेन्द्र दत्त पाण्डेय की पत्नी नरमेध के समय अपने पीहर प्रतापगढ़ में गयी इसलिए उनके प्राण बच गये। उनके गर्भ में पले अहिरुद्र पाण्डेय मलांव के पुन: वंश संस्थापक बने। लगभग सत्तर वर्षीय शरदेंदु कुमार पाण्डेय अहिरुद पाण्डेय की 18वीं पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं। वे बताते हैं कि 25 वर्ष की आयु में अहिरुद्र पाण्डेय ने ननिहाल से लौटकर फिर से मलांव को बसाया। अहिरुद्र पाण्डेय के वंशज बाद में बहुत से स्थानों पर बिखर गये। इच्छा पाण्डेय कनैला गांव गये जिनकी पीढ़ी में राहुल सांकृत्यायन पैदा हुये। बस्ती से लेकर बिहार तक और उधर मध्य प्रदेश और अन्य कई स्थानों पर भी यहां के पाण्डेय कालांतर में गये। बातचीत में शरदेंदु पाण्डेय कहते हैं कि आज भी मलांव की यश कीर्ति पूरी दुनिया में है और अकेले राहुल सांकृत्यायन ने इस गांव को अमर कर दिया है। श्रीभवन के हेरिटेज बनाने के पीछे उनकी मंशा गांव की गौरवगाथा को जीवंत रूप देना है।

पांड्य राजवंश:.                                               
 
इतिहास, युद्ध और मंदिर पांड्य राजवंश द्वारा निर्मित !
पाण्ड्य राजवंश का परिचय :-                              
तमिल प्रदेश का तीसरा राज्य पाषणों का था जिसमें प्रारम्भ में तिनेवेली, रामनाड तथा मदुरा का क्षेत्र सम्मिलित था । पाण्ड्यों का इतिहास भी अत्यन्त प्राचीन है । रामायण, महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, अशोक के लेखों के साथ-साथ यूनानी-रोमन (क्लासिकल) विवरणों में भी इनका उल्लेख प्राप्त होता है ।
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 🕉️🚩भरवलिया पाण्डेय (मलाव वंशियो ) के कुल देवता आदि देव ब्रहम बाबा & कुलदेवी दुर्गामाता, 
हमारे गांव भरवलिया पाण्डेय के आदि देव ब्रहम बाबा  के स्थान पर परम श्रद्धेय पंडित श्री तुलसी दास जी महराज जी द्वारा  रचित। श्री राम चरित मानस पाठ का आयोजन किया गया है। "💐🙏
ब्रह्म बाबा मेरा गाँव भरवलिया पाण्डेय & हमारे कुल कि रक्षक करता है ! 
भारतीय संस्कृति दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखती है। और इस संस्कृति के सूत्रधार है सनातन हिंदू धर्म, वैसे तो यहां कई धर्मों के अनुयायी रहते हैं लेकिन भारतीय संस्कृति की शुरूआत सनातन धर्म से ही शुरू हुई थी। 
हमारी संस्कृति है कि हम कोई भी कार्य शुरू करने से पहले देवी-देवताओं को पूजते हैं। ये वो देवी या देवता होते हैं जो हमारे कुल में पूजे जाते हैं। 
कुल देवी या देवता की पूजा कब से की जा रही है यह कहना बिल्कुल सटीक तो नहीं होगा, लेकिन पौराणिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि कुल देवी या देवताओं की पूजा-अर्चना का विधान वैदिक काल से है।
हम इतिहास के पन्नों के पलटें तो पाएंगे कि छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु स्वामी समर्थ रामदास जी ने उन्हें कुलदेवी भवानी माता की उपासना बताई थी। कुल देवी और देवता हमारे कुल की हमेशा संकटों से रक्षा करते हैं। 
हिन्दू पारिवारिक श्रृंखला में प्रत्येक हिन्दू परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज रहा है। जिनसे उनके गोत्र का पता चलता है, बाद में कर्मां के अनुसार इनका विभाजन वर्णों कर दिया गया।
पहले के हमारे कुलों यानी पूर्वजों के खानदान के वरिष्ठों ने अपने लिए उपयुक्त कुल देवता अथवा कुलदेवी का चुनाव कर उन्हें पूजना शुरू किया था,ताकि परालौकिक शक्तियों से कुल की रक्षा हो सके और कुल आगे बढ़े और समृद्धि हासिल कर सके। 
ध्यान रखें यदि आपको अपने कुलदेवी या कुलदेवता के बारे में जानकारी न हो तो कुटुंब के ज्येष्ठ, अपने उपनामवाले बंधु, जातिबंधु, गांव के लोग, पुरोहित आदि से कुलदेवता की जानकारी प्राप्त जरूर करें। 
जो लोग हमेशा से गाँवो से दूर या बड़े शहरों में रहे है। उनके लिए ये बात हास्य प्रद होगी।
किन्तु जो लोग गाँवो से जुड़े है वे लोग बरम बाबा का नाम हमेशा ही सुनते होंगे। और इनपे विस्वास भी करते है। जैसे कि मैं भी करता हूँ।
     यदि आप गांव से जुड़े है। तो कुछ दैवीय शक्तियो के बारे जरूर सुने होंगे या स्वयं भी जानते होंगे । इसमे मुख्य बरम बाबा,  डीह बाबा, चौरा देवी, सति देवी है।
आज हम बरम बाबा के बारे में बात करेंगे ।
बारम बाबा - नवजवान अविवाहित ब्राम्मण
कुमार जिनकी मृत्यु समय से पहले या अकाल मृत्यु हो जाती है। और मृत्यु के बाद भी वो अपनी शक्तियों के दम पे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी मौजूदगी को व्यक्त करते है । और अपने होने का अहसास दिलाते है ऐसी आत्माओं को बरम कहा जााता है।
     इन प्रेत आत्माओ को शान्त करने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनके प्रिय स्थान या मृत्यु के स्थान पे उन्हें पूज्यनीय रूप में स्थापित किया जाता है  और बारम बाबा के नाम पूजा जाता है
पूजा बिधि और सामग्री- किसी भी देवता के पूजन की कई बिधि होती है। उसी प्रकार बरम बाबा की भी लोग अलग अलग प्रकार से पूजा करते है सबसे साधारण बिधि है। की आप उन्हें दीप की आरती करें और अगरबती दिखा कर भोग लगाएं और उन्हें खड़ाऊ  लंगोट अर्पित कर अपनी मनोकामना बताये और उनपर विस्वास बनाये रक्खे उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होगी। 💐🙏
ब्रहम बाबा सबकी रक्षा करें
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जय श्री राम
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#हर हर महादेव❣️💐🕉️🚩♥️🙏

 मेरा संतोष नाम का मतलब :- 
      संतुष्टि , तुष्टि, पाप से मोक्ष, ऋण का चुकाव, ऋणमुक्ति , आनंद, सुख, शांति, वैराग्य, स्थिरता, 
 निस्तब्धता , संधि, संराधन, विरोध की शान्ति, मित्रता का नवीनीकरण, पुनर्मिलन ,भोज, उत्सव, त्योहार, प्रीतिभोज, नर्मी, नम्रता, क्षमाशीलता , सुलह, मिलान, मिलाप, संधि ,अफरा, अफराव , परितृप्त  💞
अगर आप अपने बच्चे का नाम संतोष रखने की सोच रहें हैं तो पहले उसका मतलब जान लेना जरूरी है। आपको बता दें कि संतोष का मतलब संतोष, खुशी होता है। संतोष, खुशी मतलब होने के कारण संतोष नाम बहुत सुंदर बन जाता है। आपको बता दें कि अपने शिशु को संतोष नाम देकर आप उसके जीवन में सकारात्मक संभावनाओं को बढ़ा सकते हैं। नाम का मतलब संतोष, खुशी होने की वजह से संतोष नाम के लोगों को समाज में भी बहुत पसंद किया जाता है। यह माना जाता है कि यदि आपका नाम संतोष है और इसका अर्थ संतोष, खुशी है, तो इसका गहरा प्रभाव व्यक्ति के स्वभाव पर भी पड़ता है। नीचे संतोष नाम की राशि, लकी नंबर और स्वभाव एवं संतोष, खुशी के बारे में विस्तार से बताया गया है। 
संतोष नाम की राशि :- 
भगवान शनि देव और हनुमान जी को कुंभ राशि का आराध्य देव माना जाता है। कुम्भ राशि के संतोष नाम के लड़कों की उत्तेजना और परिसंचरण को यूरेनस ग्रह द्वारा नियंत्रित किया जाता है। वर्षा ऋतु का अन्त होने के बाद इस राशि के संतोष नाम के लड़के जन्म लेते हैं। इन संतोष नाम के लड़कों में दूसरों की मदद करने का गुण, ऊर्जा और बुद्धि कूट कूट कर भरी होती है। इन्हें दोस्ती करना पसंद होता है।
संतोष नाम का शुभ अंक :- 
 जिन लोगों का नाम संतोष और शुभ अंक 8 होता है, उन्हें धन की कोई कमी नहीं होती। इस अंक वाले लोगों को अपने नियम खुद बनाना और उनका पालन करना अच्छा लगता है। संतोष नाम के व्यक्ति को संगीत से काफी लगाव होता है। दूसरों की मदद या किस्मत पर संतोष नाम के लोग आश्रित नहीं रहते। ये खुद के प्रयासों से सफलता की ऊंचाई तक पहुंचते हैं। ये दयालु स्वभाव के होते हैं लेकिन इन्हें अपने जीवन में सफलता थोड़ी देर से मिलती है।
संतोष नाम के व्यक्ति का व्यक्तित्व :- 
संतोष नाम के लोगों की कुंभ राशि होती है। ये खुद पर कंट्रोल रखने वाले और बहुत नरम दिल के लोग होते हैं, इनमें गुणों की कोई कमी नहीं होती है। कुंभ राशि के लोग खुद पर बहुत गर्व करते हैं, क्योंकि इनमें बुद्धि की कोई कमी नहीं होत है। अक्सर इन लोगों को समझ पाना मुश्किल होता है। कुंभ राशि के लोग समाज में अच्छा व्यवहार करते है, लेकिन मित्र बहुत ध्यानपूर्वक चुनते हैं। इस राशि के लोग जरूरतमंद के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उनकी मदद भी करते हैं।

"दोस्तों शुरू से ही भगवा रंग हिन्दुओ की पहचान रहा हैं, भगवा रंग आज भी हमारे देश में त्याग, बलिदान, वीरता और पराक्रम का प्रतीक हैं, और ऐसा इसलिए हैं क्युकी भगवा ध्वज भारत का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक ध्वज हैं। प्राचीन काल से लेकर आज तक सभी मंदिरों और आश्रमों में भगवा रंग का ध्वज ही लगाया जाता हैं और तो और इस संसार में हिंदुत्व को लेकर जो कुछ भी प्रमुख रूप से मौजूद हैं उन सभी का रंग भगवा हैं जैसे की अग्नि, सूर्यादय, सूर्यास्त, शिवाजी का ध्वज, कृष्णा और अर्जुन का ध्वज, ऋषि मुनियों की वेश भूषा से लेकर बजरंगबली को अर्पित सिन्दूर का रंग भी भगवा (केसरिया) ही होता हैं, इसी वजह से भगवा रंग प्राचीन काल से ही हिन्दू होने का प्रतीक रहा हैं। आज भी हिन्दुस्तान के राष्ट्रीय ध्वज में सबसे पहले भगवा रंग ही आता हैं, और इसी ध्वज को साक्षी मानकर सारे कार्यकर्ता राष्ट्रसेवा, जनसेवा की शपथ लेते हैं और उनको समझाया जाता हैं कि राष्ट्राध्वज तिरंगा के जैसे ही धर्म ध्वज का भगवा ध्वज सन्मान करे। स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पे राष्ट्रध्वज तिरंगा को भी मानवंदना दी जाती हैं। भगवा ध्वज की रक्षा और सम्मान के लिये करोड़ हिंदु जन तैयार हैं।"



संतोषकुमार भगीरथी पांडे  at 2.25PM.


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