"बूँदों की रिमझिम में प्रकृति की धुन सुनाई देती है, जो मन को भीगाकर आत्मा को शीतल कर देती है।"
जो इस दीवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है
गये सावन में ये दीवारें यूँ सीली नहीं थीं
न जाने इस दफ़ा क्यूँ इनमें सीलन आ गयी है
दरारें पड़ गयी हैं
और सीलन इस तरह बहती है जैसे
ख़ुश्क रुख़सारों पे गीले आँसू चलते हों
ये बारिश गुनगुनाती थी, इसी छत की मुंडेरों पर
ये घर की खिड़कियों के काँच पर उंगली से लिख जाती थी संदेसे
बिलखती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानों के पीछे
ये घर की खिड़कियों के काँच पर उंगली से लिख जाती थी संदेसे
बिलखती रहती है बैठी हुई अब बंद रोशनदानों के पीछे
बिना मोहरों के खाली खाने रखे हैं
न कोई खेलने वाला है बाज़ी
और ना कोई चाल चलता है
न कोई खेलने वाला है बाज़ी
और ना कोई चाल चलता है
न दिन होता है अब न रात होती है
सभी कुछ रुक गया है
वो क्या मौसम का झौंका था
जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है 💓💕⛈️🌧️💧💧
सभी कुछ रुक गया है
वो क्या मौसम का झौंका था
जो इस दिवार पर लटकी हुई तस्वीर तिरछी कर गया है 💓💕⛈️🌧️💧💧





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